इस पोस्ट के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद्र के जीवन का पूरा सफर किस तरह से उन्होंने अपने जीवन को सफल बनाया है और किन-किन कठिनाइयों से होकर उन्हें गुजरना पड़ा है इन सब बातों को इस पोस्ट के माध्यम से जानेंगे तथा इसके कौन-कौन से नीति सामने आई या यूं कहें तो इसके जीवनी को इस पोस्ट में मैने लिखने का कार्य किया है आप लोग इसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करें तो चलिए शुरू करते हो मुंशी प्रेमचंद्र के कहानी या जीवनी।


  • प्रेमचंद का जन्म कब हुआ था ?
      31 जुलाई 1880 
  • प्रेमचन्द का मृत्यु कब हुआ था ?
        8 ओक्टुबर 1936 
       धनपत राय 
  • प्रेमचंद के चाचा और चाही उन्हें किस नाम से पुकरते थे ?
      नबाब 
  • प्रेमचंद का जन्म कहा हुआ था ?
        वाराणसी (उत्तर प्रदेश )
  • प्रेमचंद का जन्म किस गॉव मे हुआ था ?
       लमही 
       अजायब राय 
  • प्रेमचंद के माता का क्या नाम था ?
     आनंदी 
  • प्रेमचंद के  दूसरी पत्नी  का क्या नाम था ?
       शिवरानी देवी 
  • प्रेमचंद का शिक्षा कहा से प्रारंभ हुआ ?
       अपने गॉव मे मौलबी साहब के यह से 
  • प्रेमचन्द्र का किस उम्र मे शिक्षा प्रारंभ हुआ ?
          8 बर्ष 
  • प्रेमचंद ने कब से कहानी लिखना प्रारंभ किया था ?
        1907 
  • प्रेमचंद स्वतंत्र आन्दोलन मे कब हिस्सा लिया था ?
      1930 
  • प्रेमचंद की मृत्यु कितने वर्ष मे हुआ था ?
        56 वर्ष 
  • प्रेमचंद का उपन्यास कब प्रकाशित हुआ था ?
       1901-1902 
  • प्रेमचंद B A की परीक्षा कब पास की ?
        1919 
  • प्रेमचंद मैट्रिक और इंटर की परीक्षा किस  श्रेनी से पास की थी ?
        द्वितीय 


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प्रेमचंद्र की कहानी जो लोगों को प्रेरित करता है।


premchand ka jivni



वाराणसी से 6 किलोमीटर की दूरी पर लमही गांव में 31 जुलाई 1880 ईस्वी को प्रेमचंद का जन्म हुआ था मां बाप ने इसका नाम धनपत रखा था चाचा चाची प्यार से उन्हें नवाब कहा करते थे। 


पिता का नाम अजायब राय था इनके पिता जी डाकखाने में किरानी का काम करते थे इसलिए उन्हें मुंशी आजाद लाल कहा करते थे माता का नाम आनंदी था जो अक्सर बीमार रहती थी पिता को दवा दारू से कभी फुर्सत नहीं मिलती थी।


धनपत 7 वर्ष का ही था मां का देहांत हो गया मां के चले जाने से धनपत से बचपन का सारा रस शौक लिया कुछ वर्ष बाद इसके पिता जी ने दूसरी शादी की बी माता का निष्ठुर व्यवहार भी उसमें आ गई नई मां बात बात करती थी उसे धनपत में बुराई ही बुराई दिखती थी।

गरीबी घुटन और रूखे पन से त्राण पाने के लिए बालक धनपत में इस प्रकार एक सहज रास्ता निकाल लिया था रोने खींचने वाली परिस्थितियों पर कहकहे हावी होने लगा प्रेमचंद्र ने बचपन से ही मुसीबत पर हसना सीख रखा था।

धनपत के छात्र जीवन की आपबीती प्रेमचंद्र की कहानियां उपन्यास और आत्मकथा में बिक्री पर ही थी जब उसकी उम्र 8 साल की थी उसके चचेरे भाई हलधर के साथ गांव के एक मौलवी साहब के यहां पढ़ने जाया करता था सवेरे बासी रोटी खाकर दोपहर के लिए मटर और जो का चबेना लेकर चल दिया करते थे मौलवी साहब के यहां हाजिरी का कोई रजिस्टर्ड नहीं था और ना ही गैर हाजरी में किसी को जुर्माना देना पड़ता था कभी-कभी हफ्ते भर तक गैर हाजरी रहा करते थे पर मौलवी साहब ने ऐसा बहाना कर देते कि उनकी चढ़ी यूरिया उतर जाती थी।

 जब उनके पिता का तबादला गोरखपुर हुआ बच्चे भी साथ गए गांव के मदरसे से शहर का स्कूल में अच्छा था धनपत की तबीयत पढ़ने में लग गई गुल्ली डंडे का खेल पीछे छूट गया शहरी नजारे आगे सरक गए किताबें चाटने का चस्का इसी उम्र में लग गया हजारों कहानियां और सैकड़ों छोटे-छोटे उपन्यास धनपत में इसी उम्र में पढ़ डालें यह साहित्य उर्दू का था

इसका कहानीकार शायद पैदा हो चुका था रात को अकेले में तीव्री कीमत भी रोशनी में उसने गल्फ रचना शुरू कर दी थी बीसीओ पन्नों से ही लिख लिख जाना और उन्हें फार डालना यह सब कितना अच्छा लगता होगा धनपत हो


उन्हीं दिनों पिता ने शादी करवा दी जो लड़की धनपत के लिए चुनी गई थी वह धनपत को कभी पसंद नहीं आई पुत्र के पांव में अष्ट धातु की वीडियो डालकर मुंशी आजाद लाल ने हमेशा के लिए आंखें मूंद भी परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा अपनी इसी दिनों की दशा का वर्णन मुंशी प्रेमचंद्र ने जीवन सागर में किया है पांव में जूते ना थे पर साबुन के कपड़े ना थे महागाई अलग थी रुपए में 20 शेर के जो थे स्कूल में 3:30 बजे छुट्टी मिलती थी फांसी के कॉलेज में पढ़ता था एडमिशन फीस माफ कर दी थी और वह एक लड़के को पढ़ाने जाया करता था। 

वहां से उसका  घर 8 किलोमीटर की दूरी पर था तेज चलने पर भी 8:00 से पहले ghar  ना पहुंच पाता प्रातः काल 8:00 बजे फिर घर से चलना पड़ता था कभी स्कूल वक्त पर नहीं पहुंचता रात को खाना खाकर कुंती के सामने पढ़ने बैठता और ना जाने कब खो जाता फिर भी हिम्मत बांधे रखता था

एबी पिता की मृत्यु फ्रिज में बड़ा असमानी परिश्रम कुप्पी के सामने बैठकर रात की पढ़ाई जैसे तैसे उन्होंने द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक परीक्षा पास की गणित से बहुत डरते थे इंटरमीडिएट में दो बार फेल हो चुके थे निराश होकर पढ़ाई का विचार छोड़ ही दिया था आगे चलकर 10 12 वर्ष बाद जब गणित के विकल्प में दूसरा विषय लेना संभव हुआ तभी धनपत राय ने  इंंतरमिडिएट की  परीक्षा पास की। 2 दिन एक एक पैसे का खा कर काटे थे महाजन ने उधार देने से मना भी कर दिया था बड़ी व्यवस्था से पुरानी पुस्तकों को लेकर एक पुस्तक विक्रेता के पास पहुंचे जो एक छोटे से स्कूल के प्रधानाध्यापक भी थे उन्होंने इनकी गरीबी और विवशत के साथ ही उस आद्रता और लगन से प्रभावित होकर अपने यहां सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त करने का आश्वासन दिया और दूसरे दिन से मासिक वेतन ₹10 पर नियुक्ति हो गई


सन 1919 ईस्वी में बीए भी कर लिया वे ma भी करना चाहते थे कानून की पढ़ाई भी पढ़ना चाहते थे लेकिन परीक्षाओं की तरफ से उदास हो गए थे जब उमंग थी तब गणित में बाधा पहुंचाई और जब वह वादा दूर हुई तो जीवन का लक्ष्य ही बदल चुका था स्कूल मास्टर का उनका जीवन भारी घुटन और बेबसी का जीवन रहा तो क्या प्रेमचंद की कहानियों में इसी का उल्लेख है पंडित चंद्र भर के रूप में स्वयं प्रेमचंद्र कहते थे वह पछताते रहते थे

 कि किसी अन्य विभाग में नौकरी की होती तो अब तक हाथ में चार पैसे होते हैं आराम से जीवन व्यतीत होता यहां तो महीने भर प्रतीक्षा करने के बाद वही ₹15 देखने को मिलता है वह भी इधर आए और उधर चले गए ना खाने को ना सुख ना पहने को आराम इससे तो मजदूर ही भले थे।  

इनकी पहली शादी चाचा और चाची की राय से हुई थी लड़की ना केवल बदसूरत थी बल्कि प्रेमचंद से उम्र में बड़ी थी नासमझ भी थी जो हमेशा अपने पति से लड़ता रहता था और पति के साथ होली मां से भी लड़ता रहा। 


10 12 वर्ष बाद 1905 अभी तक तो धनपत राय ने पहली बीवी का साथ जैसे कैसे निभाया किंतु जब उसके साथ एक दिन भी निभाना मुश्किल हो गया तो शिवरानी देवी नाम का एक बाल विधवा से शादी करके धनपत राय ने समाज के सामने भारी साहस और आत्मविश्वास का परिचय दिया। 


धनपत राय पढ़ाकू तो था ही कलम भी चलने लगी थी मैट्रिक पास करने से पहले ही उनको लिखने का चस्का लग गया था पढ़ाई और ट्यूशन आदि से जो वक्त बचा हुआ सारा का सारा किस्से कहानियां पढ़ने में लगाता है किस्से कहानियां का जो भी असर दिमाग पर पड़ता है उसे अपनी साइज कल्पनाओं में गोल गोल कर मुंशीजी नई कथावस्तु तैयार करने लगे थे और कागज पर उतरने भी लगे थे । 


1901 और 1902 मे उनके एक दो उपन्यास भी निकल चुके थे कहानियां 1907  में लिखना शुरू किए अंग्रेजी में रविंद्र नाथ की नई गर्ल पर पड़ी थी मुंशी ने उन लोगों के उर्दू रूपांतरण पत्रकारों में छपवा  पहली कहानी थी संसार का सबसे अनमोल रत्न,,,,, जो 1907 में कानपुर के उर्दू मासिक जमाना में प्रकाशित हुई थी जमाना में धनपत की अन्य रचनाओं का प्रकाशन 1903 से 1904 में ही शुरू हो गया था 1904 बी के अंत तक नवाब राय जमाना के अस्थाई और विशिष्ट लेखक हो चुके थे। 


1905 तक आते-आते प्रेमचंद्र तिलिस्मी अय्याशी काल्पनिक के चुंगल से छूटकर राष्ट्रीय और क्रांतिकारी भावनाओं की दुनिया में प्रवेश कर चुके थे जमाना उस समय की राष्ट्रीय पत्रिका थी सभी को देश की गुलामी खटकती थी विदेशी शासन की सुनहरी जंजीर के गुण गाने वाले गद्दार देशद्रोहियों के खिलाफ सभी के अंदर नफरत खोल दी थी शाम को जमाना के दफ्तर में आधे घंटे देशभक्तों का अड्डा जमता था प्रेमचंद को राष्ट्रीयता की दीक्षा  इसी अड्डे पर मिली थी एक साधारण कथाकार वही युग दृष्टा साहित्यकार के रूप में ढलने लगा बड़ी से बड़ी बातों को सीधे और संक्षेप में कहना या लिखना प्रेमचंद्र ने यही सीखा। 


नई पत्नी के साथ रहने लगे तब से लिखाई का सिलसिला जम गया 1960 से 1920 के दौरान प्रेमचंद्र ने बहुत कुछ लिखा दस  छोटे-बड़े उपन्यास, सैकड़ों कहानियां पत्र पत्र गांव में निबंध और आलोचना भी कम नहीं लिखी मास्टरी के दिनों में भी लिखते रहे स्कूल के सब डिप्टी इंस्पेक्टर भी थे अक्सर दौरे पर जाना होता था फिर भी रोज कुछ ना कुछ लिख लेते थे

1920 ईस्वी के बाद ज्यादातर वह हिंदी में ही लिखने लग लखनऊ के संपादक होने पर उनकी प्रतिभा और योग्यता की बूंद बूंद हिंदी संस्कार को मिलने लगी है फिर भी जमाना को प्रेमचंद्र की मौलिक उर्दू रचनाएं लगातार मिलती रही ।

1930 ईस्वी में प्रेमचंद की कहानियां का एक और संकल्प जब हुआ समर यात्रा प्रकाशित होते ही अंग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक को आपत्तिजनक घोषित कर दिया सरस्वती प्रेम से पुस्तक का सारी पंक्तियां उठा ली गई अबे अपना निजी पत्र निकालना चाहते थे पत्र पत्रिका संपादित करने की इच्छा दरअसल प्रेमचंद को कानपुर में ही मिल चुकी थी उन्नीस सौ 5 ईसवी में ही जमाना और आजाद के कालम उनकी कलम के लिए खेल का मैदान बन चुके थे सन 1921 में काशी से निकलने वाले मासिक पत्रिका मर्यादा का संपादन बड़ी कुशलता से दिया थ। अब हुए मंजे हुए पत्रकार बन गए थे 1930 ईस्वी में हंस निकला और 1932 ईस्वी में जागरण निकाला था।


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हर दर्जे की ईमानदारी और अपनी ड्यूटी अच्छी तरह निभाने की मुस्तैदी खुद तकलीफ झेल कर दूसरों को सुख पहुंचाने की लगन 100 100 बंधनों में जकड़े हुए भारत माता की स्वाधीनता के लिए आतुरता बाहरी और भीतरी बुराइयों की तरफ से लोगों को आगाह रखने का संकल्प हर तरह के शोषण का विरोध अपनी इन खूबियों से प्रेमचंद खूब लोकप्रिय हो गए थे।


प्रेमचंद्र का स्वभाव बहुत ही विनम्रता किंतु उसमें स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था दिखावा उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था कुर्ता और धोती 1920 के बाद गांधी टोपी अपना ली थी।

सरकारी नौकरी और स्वाभिमान में संघर्ष चलता ही रहता था आखिर में जीत हुई स्वाभिमान की 1920 ईस्वी में सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया और गांव जाकर जम गए कलम चलाकर 40 ₹50 की फुटकर मासिक आमदनी होने लगी बड़े संतोष और धीरज से हुए दिन प्रेमचंद्र ने गुजारा।

1921 ईस्वी में काशी के नामी देशभक्त बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने डेढ़ ₹100 मासिक पर प्रेमचंद्र को मर्यादा का संपादक बना दिय पहले संपादक बाबू संपूर्णानंद असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होकर जेल पहुंच गए थे मर्यादा को संभालने के लिए किसी सुयोग्य संपादक की आवश्यकता थी 1922 ईस्वी में संपूर्णानंद जी जेल से छूटे तो उन्हें मर्यादा वाला काम वापस मिला लेकिन बाबू शिवप्रसाद गुप्त प्रेमचंद्र को छोड़ना नहीं चाहते थे

 काशी विद्यापीठ में उन्हें स्कूल विभाग का हेड मास्टर नियुक्त कर दिया गया था डेढ़ 2 वर्ष बाद प्रेमचंद्र काशी विद्यापीठ में रहे आगे चलकर उन्हें महसूस हुआ कि विद्यापीठ को पैसे की तंगी है ऐसी स्थिति में वहां तेरा नाम ठीक नहीं और दूसरी बात यह थी कि प्रेमचंद स्वाधीनता संग्राम में कभी जेल नहीं गए विद्यापीठ जैसे राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों में जेल यात्रा किसी शिक्षण के लिए और साधारण योग्य नहीं है विशेष योग्यता समझी जाती थ।


1931 ईस्वी में प्रेमचंद्र स्वयं राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े सत्याग्रह नींव की कतार में शामिल होकर पुलिस की लाठियों का मुकाबल डट कर किया किंतु जेल जाने का उनका मनोरथ अधूरा ही रह गया।


उनकी पत्नी ने सोचा कमजोर है अक्सर बीमार रहते हैं उनको जेल नहीं जाने दूंगा वह भी आगे बढ़े सत्याग्रही महिलाओं की कतार में शामिल हुए गिरफ्तार होकर अपने जत्थे के साथ जेल पहुंच गए।

प्रेमचंद्र मन मसोसकर रह गए मजबूरी थी हाय परिवार से एक आदमी को जेल जाना ही चाहिए उस दिन का यह  भावना जोर पकड़ चुकी थी । 

यह दूसरी बात है कि वह कभी गिरफ्तार नहीं हुए कभी जेल ना गए मगर प्रेमचंद्र स्वाधीनता संग्राम के ऐसे सेनापति थे जिनकी बानी ने लाखों सैनिकों के उदय में जोश भर दिया था स्वाधीनता के लिए जनता की लड़ाई का समर्थन करते समय प्रेमचंद्र या कभी नहीं भूले की आजादी केवल एक व्यक्ति की जीवन को सुख में नहीं बनाएगी मुट्ठी भर आदमियों के लिए ही ऐसे ऐसो आराम नहीं लाएगी वह बहुजन सुखाय बहुजन हिताय होगी।

1923 ईसवी में सरस्वती प्रेस चालू हुआ प्रेमचंद की आजाद तबीयत को नौकरी भारतीय नहीं थी स्वाधीनतर आकर लिखने पढ़ने का धंधा करना चाहते थे प्रेमचंद्र खेलते वक्त उसके दिमाग में यही बात थी कि आपने किताबें आप ही छपते रहेंगे मगर प्रेमचंद्र अपने प्रेस को बरसों तक नहीं चला सके किताबों का प्रकाशन करके आज और छपाई का खर्चा निकलना मुश्किल हो गया था

1930 ईस्वी तक प्रेमचंद्र की हालत खराब हो रही फिर भी वह प्रेमचंद्र काला हो बीपी कर किसी तरह चलता रहा इसमें जो भी कुछ असर था उसे हंस और जागरण ने पूरा किया घाटा घाटा घाटा और कर्ज कर्ज कर्ज का सामना किया

बार बार निश्चय करते थे कि अब दुबारा नौकरी नहीं करेंगे अपनी किताबों से गुजारे लायक रकम निकल ही जाएगी बार-बार जमकर प्रेस में बैठते थे बार-बार पुराना कर्ज पता कर नए सिरे से मशीन के पुर्जे में तेल डालते रहते थे काम बढ़ता था परेशानियां बढ़ती थी बुढ़ापा भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था

प्रेमचंद्र को पेट की बीमारियां हमेशा पीछे रही लेकिन चिंता का रोग उनका सबसे बड़ा रोग था परिवार बड़ा था आमदनी कम था थोड़ी बहुत कटौती करके शिवरानी जो भी कुछ बचा कि उसे अपने प्रेस में डाल देता था

पढ़ने लिखने का सारा काम रात को करते थे तंदुरुस्ती बीच-बीच में टूट जाती थी दवा दारू के लिए शिव रानी रुपैया जिताया करती थी वे उस रकम को भी प्रेस में खर्च कर डालते थे फिर बाधाओं और हकीमो से सस्ती दवाएं लेते रहते थे जो बिल्कुल आराम नहीं होता था पूरी नींद सोते नहीं थे खाना भी मालूम ही किस्म का खाते थे।


1936 ईस्वी के बाद दशा कुछ बदली जरूर मगर प्रेमचंद का परिश्रम और भी बढ़ गया उनका जीवन ऐसा दीप था जिसमें लौ मध्यम नहीं था तेज प्रकाश देने को मजबूर था पर उस दिन में कभी पूरा तेल नहीं डाला लव हमेशा बत्ती के रसों को ही जलाती रहती थी 


उनकी बेचैनी इसलिए थी कि वह चाहते थे कि जीवनदीप का प्रकाश दूर-दूर तक फैले वक्त पर पहले अच्छी तरह से पहले अपनी सारी  किताबें अपना सारा साहित्य अपने प्रेस में ही छपवा कर समूचे देश में फैला देना चाहते थे किसानों मजदूरों युवकों विद्यार्थियों स्त्रियों और अछूतों की दर्दनाक जिंदगी को आधार बनाकर जो कोई भी लिखें 

सभी कुछ छाप कर जनता को सजग सचेत बना देने का संकल्प प्रेमचंद्र के अंदर था अधिक से अधिक लिखते जाना अधिक से अधिक छापते जाना अधिक से अधिक लोगों को जागरूक बनाते जाना  स्वसन, गुलामी, डोंग,  स्वार्थ, रोड़ी, अन्याय ,अत्याचार ,इन सब की जड़ें खोद डालना और धरती को नई मानवता के लायक बनाना यही प्रेमचंद्र का मुख्य उद्देश्य था 

1934 ईस्वी के बाद प्रेमचंद्र को लगने लगा कि अब वह दो 4 वर्ष से ज्यादा नहीं जिएंगे इससे उसके अंदर दिन रात लिखने की दिन रात काम करने की भावना जोर पकड़ती गई आजीवन संघर्ष और अभावग्रस्त लेखक ने अपने स्वास्थ्य चौपट कर दिया था 

अंतिम दिनों में हुए संतरे लेने लगे थे लेकिन तब तक तंदुरुस्ती बिल्कुल रूठ चुकी थी वह अच्छी तरह जानते थे कि दुबला पतला लक्कड़ शरीफ यह बीमार आदमी धनपत राय हो सकता है प्रेमचंद्र कोई और होगा प्रेमचंद्र कभी भी बार नहीं पड़ेगा प्रेमचंद्र हमेशा स्वस्थ रहेगा प्रेमचंद्र जिंदा रहेगा।


तभी तो लाभ होने की भावनाओं में निर्लिप्त रहकर प्रेमचंद्र अंत तक लिखते रहे । नींद नहीं आती थी बीमारी बढ़ गई थी प्रेस जाना बंद था फिर भी आप घर वालों की नजर बचाकर उठ जाते और कलम तेजी से चल पड़ती इतनी तेजी से कि जीवन समाप्त होने से पहले ही सब कुछ लिख देना चाहते थे

मंगलसूत्र के बीसीएम सफेद प्रेमचंद्र ने मृत्यु शैया पर लिखें महाजनी सभ्यता और कई फन और प्रगतिशील लेखकों की पहली कॉन्फ्रेंस के लिए अध्यक्ष का भाषण काफी कुछ उन्होंने हमें अपने अंतिम क्षणों तक दिया। मैं मजदूर हूं जिस दिन ना लिखूं उस दिन मेरी रोटी खाने का अधिकार नहीं यह सब उनके होठों के केवल आभूषण ही ना थे बल्कि सच भी थे

फिल्मों के द्वारा जनता तक अपने संदेशों को प्रभावशाली ढंग से पहुंचाने और साथ ही अभावों से मुक्ति पाने के लिए वह मुंबई भी गए थे

 किंतु धनपत को धन पतियों का सहवास और मुंबई का प्रवास रास नहीं आया वह उनकी अभिलाषा ओं की पूर्ति नहीं कर पाया फिर वही प्रेस फिर वही प्रकाशन फिर वही जिस आए रातों रात जमकर प्रेमचंद्र ने गोदान पूरा किया


दान छप कर निकल आया था कि उनकी लेखनी मंगलसूत्र पर तेजी से चल रही थी

पे मरते प्रेमचंद्र इस उपन्यास को पूरा करना चाहते थे चार ही अध्याय लिख पाए थे खाना हजम नहीं होता था खून टपकने लगा था पेट में पानी भर गया था दूध फलों का रस तक नहीं पहुंचा सकते थे 

पर इतने पर भी काम करने की ललक पीछा नहीं छोड़ती थी लिखने की अभिलाषा शांत नहीं हो पाती थी देश को अपनी जीवन अनुभव और विचारों की अंतिम बूंद तक दें जाने की इच्छा चैन नहीं लेने देती थी


8 अक्टूबर 1936 ईस्वी प्रेमचंद्र ने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर ली अभी 60 वर्ष के भी नहीं हुए थे 56 वर्ष की आयु में ही उनकी मृत्यु हो गई।

संयोग तो देखिए विश्व के महान तीन उपन्यासकार प्रेमचंद्र, सरतचंद्रचट्टोपाध्याय ,मैक्सिम गोरकी ,का देहांत इसी वर्ष हुआ था। 


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